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सुप्रीम कोर्ट ने कैसे मान लिया कि हिंसा छात्रों ने ही की थी?

सुप्रीम कोर्ट ने जामिया मामले में टिप्पणी की है कि जब तक उपद्रव नहीं रुकेगा, वह सुनवाई नहीं करेगा। सबरीमला और आरटीआई के मामले में भी कोर्ट की कुछ ऐसी ही टिप्पणियाँ आईं। इन तीनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के इन बयानों से जो संदेश निकल रहा है, वह चिंताजनक है। लेकिन कहा जाता है न कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, ऐसा लगना भी चाहिए कि न्याय हुआ है। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है?
नीरेंद्र नागर

अभी कुछ दिनों पहले जिस सुप्रीम कोर्ट ने ‘हिंसा के डर से’ सबरीमला के बारे में प्रतिकूल आदेश देने से परहेज़ किया था, उसी सुप्रीम कोर्ट ने कल ‘हिंसा को ही आधार’ बनाकर जामिया विश्वविद्यालय में हुई पुलिसिया कार्रवाई पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि जब तक उपद्रव नहीं रुकेगा, वह सुनवाई नहीं करेगा। दोनों बेंचों की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ही कर रहे थे।

यह विचित्र नहीं है क्या? सबरीमला का मुद्दा - वे हिंसा कर सकते हैं, इसलिए हम उनके ख़िलाफ़ आदेश नहीं देंगे। जामिया का मुद्दा - वे हिंसा कर रहे हैं, इसलिए हम उनका पक्ष नहीं सुनेंगे।

आश्चर्य की बात यह है कि कोर्ट यह बात तब कह रहा है जबकि अभी यह तय भी नहीं हुआ है कि जामिया मामले में हिंसा किसने की। ताज़ा ख़बरों के अनुसार पुलिस ने जिन 10 लोगों को गिरफ़्तार किया है, वे जामिया के छात्र नहीं हैं, स्थानीय लोग हैं। वकीलों की याचिका भी इसी मुद्दे पर थी कि पुलिस ने जामिया विश्वविद्यालय में घुसकर छात्रों को मारा-पीटा और तोड़फोड़ की। उनका मुद्दा यही था कि पुलिस ने निर्दोष छात्रों के ख़िलाफ़ अनुचित कार्रवाई की।

याचिका पुलिस की ज़्यादतियों पर थी और कोर्ट माँग कर रहा था कि पहले हिंसा रुके। इससे तो लगता है कि कोर्ट पहले ही तय कर चुका है कि हिंसा छात्रों ने की और वे ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। इसी आधार पर उसने प्रथम दृष्टया छात्रों को दोषी ठहरा दिया।

वैसे तर्क के लिए मान लिया जाए कि कुछेक छात्रों ने तोड़फोड़ की तो क्या पुलिस को अधिकार बनता है कि उसके सामने जो भी छात्र आए, उसे वह लहूलुहान कर दे? यही नहीं, कमरों में घुस-घुसकर उनकी तलाश करे और पिटाई करे? दो छात्रों को तो गोलियाँ तक लगी हैं। ये गोलियाँ किसने चलाईं?

याचिका इसी बात पर थी और मामले पर जब आगे सुनवाई होगी तो ये मुद्दे उठेंगे। तब देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कोर्ट इस बारे में अपना नज़रिया बदलता है?

चीफ़ जस्टिस बोबडे ने कल एक और मामले में इसी तरह का एक बयान दिया जिसका मुद्दे से कुछ लेना-देना नहीं था। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इन दिनों आरटीआई एक्टिविस्ट बन गए हैं और ऐसा लगता है जैसे सूचना का अधिकार उनका पेशा बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग इसका सहारा लेकर ब्लैकमेलिंग का धंधा कर रहे हैं।

अब पहले जानते हैं कि मुद्दा क्या था। मुद्दा था आरटीआई आयुक्त की नियुक्ति का जिसके बारे में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस काम में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही। सोचिए, इसमें आरटीआई के दुरुपयोग का मामला कहाँ से आ गया? लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सूचना के अधिकार का दुरुपयोग हो रहा है और इस कारण सरकारी मशीनरी में 'भय और जड़ता’ का माहौल बन गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग जिनका किसी ख़ास सूचना से कोई लेना-देना नहीं है, वे ब्लैकमेलिंग के लिए वैसी सूचना माँगकर इसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।

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सूचना माँगे जाने से कोई क्यों डरेगा? 

अब पहली बात तो यह कि आख़िर सूचना माँगे जाने से कोई क्यों डरेगा? अगर डरेगा तो भी वही डरेगा जिसने कोई ग़लत काम किया है। यदि किसी सरकारी अधिकारी या मंत्री ने सही काम किया है, नियमों के अनुसार किया है तो उसको कोई भी सूचना देने में क्या दिक़्क़त है चाहे वह मैं माँगूँ, आप माँगें या कोई और माँगे? 

यही बात वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कही। उन्होंने कहा, डरेगा वही जो भ्रष्ट है। हालाँकि उन्होंने अंत में यह भी कहा कि वे इस मुद्दे का हल खोजेंगे कि कैसे आरटीआई का दुरुपयोग रोका जाए।

सबरीमला, जामिया और आरटीआई के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के इन बयानों से जो संदेश निकल रहा है, वह चिंताजनक है। लेकिन कहा जाता है न कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, ऐसा लगना भी चाहिए कि न्याय हुआ है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के हर जज, और ख़ासकर चीफ़ जस्टिस से हम यही उम्मीद करते हैं कि वे ऐसा कुछ न कहें जिससे किसी को यह लगे कि इस शीर्ष अदालत में फ़ैसले क़ानून और संविधान के आधार पर नहीं, किसी और बुनियाद पर होते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट का काम क्या?

सबसे पहले यह समझना होगा कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट और अदालतों की भूमिका संविधान के मुताबिक़ क्या है। भारत का संविधान शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है ताकि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच में एक संतुलन बना रहे और सरकारें अधिनायकवाद के रास्ते पर न चलें। सुप्रीम कोर्ट को संविधान का संरक्षक कहा जाता है और जब नागरिक को विधायिका और कार्यपालिका से न्याय नहीं मिलता या उसके अधिकारों का हनन होता है तब वह सुप्रीम कोर्ट या अदालतों की शरण में जाता है। 

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क्या कोर्ट की भूमिका बदल रही है?

सबरीमला का मामला हो या फिर जामिया का मामला हो या फिर सूचना आयुक्त की नियुक्ति का, इनमें सबरीबमला और जामिया में नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ और सुप्रीम कोर्ट में उनकी अर्जी नागरिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए की गई थी जबकि सूचना आयुक्त के मामले में आरटीआई क़ानून को जिस तरीक़े से सरकार की ओर से जिस तरह से लगातार कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है, उसकी पुनर्स्थापना का सवाल खड़ा किया गया था। इन तीनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट का रुख समझ से परे है और ऐसा लगता है जैसे सुप्रीम कोर्ट अपनी भूमिका को बदलने की दिशा में बढ़ रहा है।

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद वहाँ के नागरिकों के अधिकारों की पुनर्स्थापना के प्रश्न पर भी सुप्रीम कोर्ट का रवैया कोई बहुत प्रेरणा नहीं देता। ऐसे में सवाल यह है कि अगर अदालतें और सुप्रीम कोर्ट नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सामने नहीं आएँगी तो फिर नागरिक बेचारा कहाँ जाएगा। हम उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियाँ महज़ फ़ौरी विचलन हैं, स्थायी भाव नहीं।

नीरेंद्र नागर

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